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खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो,जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो: सत्य लिखना यदि अपराध है,तो यह अपराध बार-बार होगा!!

स्याही से लिखी गई सच्चाई,इतिहास बदलने की ताकत रखती..

Chief editor__ ISRAR AHMAD

हिन्दी पत्रकारिता की प्रारंभिक यात्रा संघर्षों से भरी रही।आर्थिक संकट,सरकारी उपेक्षा और तकनीकी अभाव के बावजूद हिन्दी समाचार पत्रों ने समाज को नई दिशा देने का कार्य किया। “बनारस अखबार”,“हिन्दी प्रदीप”,“कवि वचन सुधा”, “भारत मित्र”, “सरस्वती” और “प्रताप” जैसे पत्रों ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया। उस समय पत्रकारिता व्यवसाय नहीं,बल्कि राष्ट्र सेवा का माध्यम थी।पत्रकार अपनी लेखनी के माध्यम से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज उठाते थे और समाज में शिक्षा, स्वाभिमान तथा स्वतंत्रता की भावना का संचार करते थे।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक,गणेश शंकर विद्यार्थी,बाबूराव विष्णु पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी और महात्मा गांधी जैसे महान पत्रकारों एवं विचारकों ने अपनी लेखनी को राष्ट्रहित के लिए समर्पित कर दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी का “प्रताप” केवल समाचार पत्र नहीं था,बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की आवाज था।बाबूराव विष्णु पराड़कर ने हिन्दी पत्रकारिता को वैचारिक गंभीरता और सामाजिक उत्तरदायित्व प्रदान किया।महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम माना और सत्य,नैतिकता तथा जनहित को पत्रकारिता का मूल आधार बनाया।उस दौर की पत्रकारिता मिशन की पत्रकारिता थी।पत्रकार सत्ता के गलियारों में नहीं,बल्कि जनता के बीच खड़े दिखाई देते थे।लेखनी जेल गई,अखबार बंद हुए,मुकदमे चले, लेकिन कलम झुकी नहीं।

“सत्य लिखना यदि अपराध है,

तो यह अपराध बार-बार होगा।”

यह भावना उस समय की पत्रकारिता की पहचान थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी पत्रकारिता ने राष्ट्र निर्माण में नई भूमिका निभाई।गाँव,गरीब, किसान,मजदूर,श्रमिक और आम नागरिक की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया गया।रेडियो, दूरदर्शन और बाद में उपग्रह चैनलों के आगमन ने पत्रकारिता के स्वरूप को व्यापक बनाया।हिन्दी समाचार पत्रों का प्रसार गांवों तक पहुंचा और हिन्दी भाषा देश की सबसे प्रभावशाली मीडिया भाषा बनकर उभरी।हिन्दी पत्रकारिता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषा और जनसरोकार रहे हैं।हिन्दी ने उन लोगों की आवाज को शब्द दिए, जिनकी पीड़ा अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती थी। यही कारण है कि हिन्दी पत्रकारिता जनमानस से जुड़ी पत्रकारिता बनी।

समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला। प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अब डिजिटल मीडिया के युग में सूचना की गति अभूतपूर्व हो गई है।आज मोबाइल पत्रकारिता, डिजिटल न्यूज़ पोर्टल,सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म,पॉडकास्ट, यूट्यूब चैनल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों ने समाचारों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब समाचार केवल अखबार के पन्नों तक सीमित नहीं,बल्कि कुछ सेकेंड में देश-दुनिया तक पहुंच जाते हैं।करोड़ों लोग मोबाइल स्क्रीन पर हिन्दी समाचार पढ़ते, सुनते और देखते हैं।आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल लोकतंत्र बन रहा है और हिन्दी दुनिया की तेजी से बढ़ती भाषाओं में शामिल है।छोटे शहरों और गाँवों से निकल रहे युवा डिजिटल पत्रकारिता में नई पहचान बना रहे हैं। इंटरनेट और तकनीक ने पत्रकारिता को महानगरों की सीमाओं से बाहर निकालकर गांवों तक पहुँचा दिया है।डिजिटल क्रांति के इस दौर में पत्रकारिता के सामने गंभीर चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं। आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट “विश्वसनीयता” का है।फेक न्यूज़,आधी-अधूरी सूचनाएं, टीआरपी की अंधी दौड़,सनसनी खेज प्रस्तुति और एजेंडा आधारित खबरों ने पत्रकारिता की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।कभी मिशन मानी जाने वाली पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा आज बाजारवाद और कॉरपोरेट दबावों के बीच संघर्ष करता दिखाई देता है।“पहले खबरों में तथ्य होते थे,अब तथ्यों में खबर खोजी जाती है।”यह कटु सत्य वर्तमान मीडिया परिवेश की गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करता है।डिजिटल युग में सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि तेज़ी की प्रतिस्पर्धा में सत्य पीछे छूटता जा रहा है।“सबसे पहले” दिखाने की होड़ में “सबसे सही” दिखाने का दायित्व कमजोर पड़ रहा है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच तो दिया है, लेकिन बिना पुष्टि की सूचनाओं ने समाज में भ्रम और अविश्वास का वातावरण भी पैदा किया है।

पत्रकारिता यदि केवल शोर बनकर रह जाएगी,तो समाज का विश्वास टूटेगा।लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका प्रहरी की होती है,प्रचारक की नहीं।पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं,बल्कि समाज को सही दिशा देना भी है।

इन चुनौतियों के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल दिखाई देता है। भविष्य मे आने वाला समय “भाषाई पत्रकारिता” का होगा। भारत की आत्मा भारतीय भाषाओं में बसती है और हिन्दी पत्रकारिता उसी आत्मा की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है।कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI),डेटा पत्रकारिता और तकनीकी नवाचार समाचारों की प्रस्तुति को बदलेंगे, लेकिन पत्रकारिता की वास्तविक आत्मा वही रहेगी।पत्रकारिता का भविष्य तकनीक से नहीं,उसकी नीयत से तय होगा। मशीनें खबर लिख सकती हैं, लेकिन समाज की पीड़ा को महसूस करने का सामर्थ्य केवल संवेदन शील पत्रकार के पास होता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता पुनः अपने मूल आदर्शों-सत्य,निष्पक्षता,जनहित और सामाजिक उत्तरदायित्व – को याद करे।“कलम बिकनी नहीं चाहिए,सत्य झुकना नहीं चाहिए।”“निष्पक्ष पत्रकारिता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा है।”हिन्दी पत्रकारिता की लगभग दो शताब्दियों की यह यात्रा केवल इतिहास नहीं,बल्कि भारत की सामाजिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है।यह यात्रा संघर्ष की भी है,साहस की भी है और जनविश्वास की भी है।आज आवश्यकता ऐसे पत्रकारों की है जो सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखें,समाज की आवाज बनें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानें।लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संसद से पहले समाज की जागरूक चेतना में बसती है और उस चेतना को जगाने का कार्य पत्रकारिता ही करती है।हिन्दी पत्रकारिता दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि कलम की ताकत किसी भी सत्ता से बड़ी होती है।यही वह शक्ति है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को जनांदोलन बनाया,लोकतंत्र को मजबूत किया और समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज को मंच प्रदान किया।

 

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